Prabha Jain Surat ने बताई कविता में प्रेम की परिभाषा

जयपुर राजस्थान में 10 दिसंबर को जन्मी प्रभा जैन [ Prabha Jain ] की बचपन से ही कविता, कहानी,ग़ज़ल, मुक्तक, लेख आदि लिखने की रूचि रही है. गौरीपुर असम से ग्रेजुएशन करने के दौरान लेखन के क्षेत्र में अनेक  राज्य एवं जिला स्तरीय प्रथम पुरस्कार प्राप्त किये. 1998 से सूरत में निवास कर रही प्रभा जैन [ Prabha Jain Surat ]  अनेक प्रसिद्ध पत्र- पत्रिकाओं में लिख चुकी है. स्वयं द्वारा प्रकाशित की जानी वाली पत्रिका संस्कार सुगंध का लम्बे समय तक संपादन किया है.
प्रभा जैन, सूरत केवल लेखन के माध्यम से ही भावी पीढ़ी के संस्कार निर्माण में अपनी भूमिका नही निभा रही है बल्कि सोशल एक्टिविस्ट के तौर पर अपनी एक संस्था भी चलाती है. 2015 में स्थापित राष्ट्रिय जैन महिला संघ में महिलाओं को रोजगार देने और गरीब कन्याओं के विवाह कराने जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी किये जाते हैं. आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा प्रदत ध्यान विधि प्रेक्षाध्यान को भी जन जन तक पहुँचाने में अपना पुरुषार्थ नियोजित कर रही है. इसलिए इनको प्रेक्षा प्रशिक्षिका के तौर पर भी जाना जाता है.
Prabha Jain Surat
तथास्तु टी वी की वेबसाइट पर उनकी कविताएँ प्रस्तुत कर हम उनके सद्कार्यों को सपोर्ट कर रहे हैं. पाठक गण भी उनकी इन रचनाओं को काव्य रसिक लोगों तक पहुंचा कर अपना सपोर्ट प्रस्तुत करे.

Prabha Jain Surat की दो कविताएँ 

 

प्रेम की परिभाषा
प्रेम एक तपता सूरज है
जिसकी हर ऊष्मा को
हर उर्मियों को
साझा करना होता है
उसकी तपिश में
जीना होता है
सूरज सिर्फ सुबह का विटामिन ही नही देता
सुबह का स्वर्णिम उजाला
ही नही देता
सूरज दोपहर की तपती
बलुई धुप,चिलचिलाती अग्नि भी देता है
प्रेम वही है
जिसे सूरज और प्रेम चाहिए
हर परिस्थिति में साथ निभाने का जज्बा होना चाहिए
न कि एक सूरज को छोड़ कर दूसरे की तलाश हो
जो सूरज की तपिश झेल ले
प्रेम की आंच में पक जाए
वो कुंदन बन निखर
जाता है।
प्रेम के समग्र रूप को समझें
अपने आस पास के लोगों से
समानता का व्यवहार करें
उनका साथ दें
हो सकता है उस वक़्त परिस्थति गलत हो
हवाएं विपरीत हो
लेकिन वो सच्चा हो
हो सकता है कोई सबूत न हो
लेकिन वक़्त सबसे बड़ा सबूत है
उस वक़्त का इंतजार करो
स्त्री होने का दर्द 
स्त्री होने का दर्द 
बचपन से भीतर तक
पहुँचाया गया था
पराया घर,पराए लोग
पराई जिंदगी
सब कुछ पराया
लेकिन
जब भीतर में झाँका
तो पाया शरीर भी
 पराया ही है
संयोग और वियोग की
 इस आत्मकथा में
मुझे मेरे होने का गर्व हुवा
स्त्री नारी औरत होने का दर्द
बहुत दूर छिटक गया
मैंने पाया
मैं ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति हूं
मेरा जन्म 
कुछ विशेष 
कारणों से हुवा है
लोगों को कुछ देने के लिए
लोगों को सिखाने के लिए
उनसे सीखने के लिए
ज्ञानावरणीय कर्मों को क्षय करने के लिए
मोहनीय कर्म को तोड़ने के लिए
सहिष्णुता का विकास करने के लिए
ममत्व विसर्जन के लिए
सबको क्षमा दान देने के लिए
सबको अभय देने के लिए
मुझे गर्व है कि
मैं अपने कृत कर्मो को
जान पा रही हूँ
उन्हें भेदने की प्रक्रिया
 समझ पा रही हूँ
समाज को जागृत करने के लिए
उन्हें समझा पा रही हूँ
भव भव के संस्कारों को
भेदने के लिए
खुद को तैयार कर पा रही हूँ
प्रभा को प्रभा के नाम अनुरूप
ढालने में सक्षम बनाने के लिए
खुद के स्त्री होने पर गर्व कर पा रही हूँ
गुरु महाप्रज्ञ को कण कण से नमन कर पा रही हूँ
प्रभा जैन सूरत [ Prabha Jain Surat ]
8511877364
Spread the love

Leave a Reply