Prabha Jain की व्यंग रचना : बाकी सब ठीक-ठाक है.

सूरत निवासी Prabha Jain एक जाना पहचाना नाम है. क्योंकि उनको एक कवित्री, समाजसेविका, मीडिया पर्सन आदि अनेको कार्यों के कारण जाना जाता है. Prabha Jain की काव्य के क्षेत्र में अनेको विधाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती रहती है. उसमे से एक व्यंग रचना Tathastu TV के पाठको के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है. विश्वाश है यह व्यंग पाठको के दिल को छुएगा और इसको बेहद सरहना  मिलेगी.

व्यंग रचना 

जीवन की मीमांसा कर रहे व्यक्ति की निष्ठा प्रतिष्ठा समाज की परिधि से हटकर  स्वयं पर आ चुकी है .स्वयं का आकलन सामाजिक दायित्व के नीचे दबे होने पर भी मुख से तो बस यही निकलता है .. बाकी सब ठीक-ठाक है. . दैनिक व्यवहार में सामान्य बच्चों की अशिष्टता को झेल रहे अभिभावक बस यही कह रहे हैं बाकी सब ठीक-ठाक है। पकाऊ गानों की धुन पर नाच रही हमारी युवा पीढ़ी पर शर्मसार होती है बुजुर्ग यही कहते दिखाई दे रहे हैं कि बाकी सब ठीक-ठाक है।
धार्मिक उत्सवों में श्राद्ध के पैमानों को झलका थे बेहूदा नृत्य करते आज के युवक उत्सव को पैसा कमाने में मौज उड़ाने का घरेलू बाजार बनाते हैं उनकी स्थिति पर तरस रहे भगवान भी यही कहते होंगे बाकी सब ठीक-ठाक है। कोरोना की महामारी के चलते भी उसे हलके में लेना,मास्क ना लगाना, भीड़ का हिस्सा बनना ।बेपरवाह मौजी अपनी  मस्ती में रंगे दुसरो को संक्रमित करके भी लापरवाही बरतते वर्ग यूँ कहते दिख रहे हैं।बाकि सब ठीक ठाक है।

संस्कृति धारा

भारतीय संस्कृति आज स्वयं को मांस कर आश्चर्य में खुल रहे हैं उसके आधुनिक संस्कृति धारा को बनाए रखने के लिए  हमारे आज के युवा वर्ग पर दयनीय दृष्टि डालें बुजुर्ग बस यही कह पा रहे हैं बाकी सब ठीक-ठाक है। नवनिर्मित बड़ी-बड़ी अटाली गांव की खिड़की से जानते तंग कपड़ों की बहाली पर रास्ते का चलता मुसाफिर यही कह रहा है बाकी सब ठीक-ठाक है। तवा संस्थाओं के अपने लड़ाई में लहूलुहान हो रहा एक आम इंसान ना चाहते भी यही दोहरा रहा है बाकी सब ठीक-ठाक है। बोझिल हो रही है जिंदगी भाषा के विकास का मार्ग अवरुद्ध करती अंग्रेजों के जूठन को भी प्रेम नगर से अपनाते हुए यही गीत गा रहे हैं बाकी सब ठीक-ठाक है।
हिंदी को इंग्लिश करते नेतागण अंग्रेजी का खूबसूरती से उपयोग करते करते यही समझा रहे हैं बाकी सब ठीक-ठाक है। भागीरथ की तपस्या फल स्वरुप गंगा मैली दर में लिखी जा रही है अंदर ही अंदर सुलगती दर्द से कराती है गंगा लोगों से यही सुन रही है बाकी सब ठीक-ठाक है। कितने की मुश्किलें सामने हो रोजमर्रा की जीवनी में तकलीफों का साम्राज्य क्यों ना बना दिया गया हो विचारों की लेखनी सदैव सकारात्मक ही होनी चाहिए बस यही कहना काफी है।

संयम का अर्थ

बाकी सब ठीक-ठाक है। रांगेय राघव जी ने तो यहाँ तक कह दिया कि संयम का अर्थ घुटना और सड़ना नहीं, स्वस्थ रहा है अब वह आओ तो स्वस्थ बहाव है परंतु उसे क्या पता कि कब उसे रोक लिया जाएगा। बल्कि वह तो जन्म से ही रुकी हुई है । बेटी जब कहीं फिल्म देखने जाना चाहती है तो मां कहती है यहां नहीं अपने पति के घर जाए तब जाना। इस घर में आजादी नहीं है ।अब मां को कौन बताए कि संयम की पालना कराने का मतलब यह तो नहीं कि उससे बंधन दे दो। कि वह इच्छाओं का दमन करना सीख जाए और ससुराल जाते जाते दम तोड़ती उम्मीदें दर किनारे हो जाएं संयम शालीनता का पर्याय बन सकता है पर उसे दम घोटू नीति का उम्मीदवार बना कर खड़ा कर दिया। स्वस्थ नीति की आधारशिला तो गुलाम देश की बपौती बनती जा रही है।

बाज़ार की भाषा 

बाजार का नमूना हर दृष्टि से फलवान बन रहा है । लाभ और बस लाभ ।बदलाव की पाठशाला में संयम का तत्व नहीं पढ़ाया जाता। वहां सिर्फ प्रचार प्रसार की घटनाओं को बल देकर स्वर्ग की सीडी पर आपको अवस्थित कर देंगे सर सर पर निकले व्याह को दूर रहकर बिन ब्याही वालों के सीने पर गाज गिरा सकते हैं।
लाभ का गणित इतना जोड़ कर रहा है कि बाकी से उसका नाता टूटता सा जान  पड़ता है । बाजार के रंग का स्वरूप इतना चमकीला व शानदार है कि सड़क पर चल रहे मासूम के अंग उसे चमक का हिस्सा बन चुके हैं। यह चमक उन अंगों पर लगे जख्म पर नमक का काम कर रहे हैं। अब बाजार बाद में हिंसा अनैतिकता , ईर्ष्या ड्रेस बहू शादी रूपी फिल्मों का चलन हमारी मांग पर बनते हैं वह दिखाए जाते हैं तो संयम व संस्कृति की धज्जियां बनते देर नहीं लगेगी। संयम के उच्च मित्रता पर मर्यादाओं का राग अलाप से यही कहते हैं बाकी सब ठीक-ठाक है।
Prabha Jain
लेखक :- Prabha Jain, Surat
Spread the love

Leave a Reply