Monday, May 25, 2026
संत - संस्कृति

तुम हमेशा ईश्वर की नज़र में हो

यह लेख ईश्वर की नजर शीर्षक से किसके द्वारा लिखा गया है, यह ज्ञात नही हुआ . पर तथास्तु टी वी की टीम को बहुत प्रेरणा प्रद और रोचक विधा में लिखा हुआ लगा.  इसलिय पाठको के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं –
एक दिन सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी,  मैं उठकर आया. दरवाजा खोला तो देखा एक आकर्षक कद काठी का व्यक्ति चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान लिए खड़ा है ।
 मैंने कहा- “जी कहिए?”
तो वह बोला- “अच्छा जी..!!  आज जी कहिये,
रोज़ तो एक ही गुहार लगाते थे..!!
प्रभु सुनिए, प्रभु सुनिये..!! आज, जी कहिये वाह..!!
मैंने आँख मसलते हुए कहा-
“माफ़ कीजिये भाई साहेब..!! मैंने पहचाना नहीं आपको” ।
तो कहने लगे- “भाई साहेब नहीं..!!
मैं वो हूँ जिसने तुम्हें साहेब बनाया है ।
 अरे ईश्वर हूँ मैं..!! ईश्वर..!!
“तुम हमेशा कहते थे, नज़र में बसे हो पर नज़र नहीं आते,  लो आ गया..!! अब…
आज पूरा दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा”।
मैंने चिढ़ते हुए कहा- “ये क्या मजाक है?”
अरे मजाक नहीं है..!! सच है..!!
सिर्फ तुम्हें ही नज़र आऊंगा, तुम्हारे सिवा कोई देख-सुन नहीं पायेगा मुझे’।
कुछ कहता इसके पहले ही पीछे से माँ आ गयी। “ये अकेला ख़ड़ा-खड़ा क्या कर रहा है यहाँ, चाय तैयार है, चल आजा अंदर..!!”
अब उनकी बातों पर थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था और मन में थोड़ा सा डर भी होने लगा था ।

ईश्वर की नज़र

मैं जाकर सोफे पर बैठा ही था तो बगल में वो आकर बैठ गए, चाय आते ही जैसे ही पहला घूँट पिया, गुस्से से चिल्लाया- “यार..!! ये चीनी कम नहीं डाल सकते हो क्या आप ?”
इतना कहते ही, ध्यान आया अगर ये सचमुच में ईश्वर है, तो इन्हें कतई पसंद नहीं आयेगा कि कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे ।
अपने मन को शांत किया और समझा भी  दिया कि भाई “तुम नज़र में हो आज” ज़रा ध्यान से… बस फिर मैं जहाँ-जहाँ, वे मेरे पीछे-पीछे पूरे घर में ।
थोड़ी देर बाद नहाने के लिये जैसे ही में बाथरूम की तरफ चला तो उन्होंने भी कदम बढा दिए ।
मैंने कहा- “प्रभु यहाँ तो बख्श दो”
खैर नहा कर, तैयार होकर मैं पूजा घर में गया, यकीनन पहली बार तन्मयता से प्रभु को रिझाया क्योंकि आज अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी ।
फिर ऑफ़िस के लिए घर से निकला, अपनी कार में बैठा, तो देखा, बगल वाली सीट पर महाशय पहले ही बैठे हुए हैं, सफर शुरू हुआ, तभी एक फ़ोन आया और फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया “तुम  ईश्वर की नज़र में हो”
कार को साइड में रोका, फ़ोन पर बात की और बात करते-करते कहने ही वाला था कि “इस काम के लिए ऊपर से पैसे लगेंगे”।
“पर ये  तो गलत था, पाप था तो प्रभु के सामने कैसे कहता तो एकाएक ही मुँह से निकल गया-
“आप आ जाइये आपका काम हो जाएगा आज” ।

इट्स ओके

फिर उस दिन आफिस में ना स्टाफ पर गुस्सा किया, ना किसी कर्मचारी से बहस की । 100-50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जाती थी मुँह से, पर उस दिन  सारी गालियाँ… “कोई बात नहीं, इट्स ओके” में तब्दील हो गयीं ।
वो पहला दिन था जब क्रोध, घमंड, किसी की बुराई, लालच, अपशब्द, बेईमानी, झूठ और रिश्वत
ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा नहीं बने ।
शाम को आफिस से निकला, कार में बैठा तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया-
“प्रभु सीट बेल्ट लगालो,
कुछ नियम तो आप भी निभाओ”…
उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी, घर पर रात्रि भोजन जब परोसा गया, तब शायद पहली बार मेरे मुख से निकला ।
“प्रभु पहले आप लीजिये” और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह में रखा । भोजन के बाद माँ बोली- “पहली बार खाने में कोई कमी नहीं निकाली आज तूने..!! क्या बात है?
सूरज पश्चिम से निकला है क्या आज?”
मैंने कहा- “माँ आज सूर्योदय मन में हुआ है..!!
“रोज़ मैं महज खाना खाता था, आज प्रसाद ग्रहण किया है माँ, और प्रसाद में कोई कमी नहीं होती।
थोड़ी देर टहलने के बाद अपने कमरे में गया, शांत मन और शांत दिमाग के साथ तकिये पर अपना सिर रखा तो उन्होंने प्यार से सिर पर हाथ फिराया और कहा- “आज तुम्हे नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी क़िताब के सहारे की ज़रुरत नहीं है”।
गहरी नींद गालों पर थपकी से खुली।
“कब तक सोएगा? जाग जा अब”। माँ की आवाज़ थी,
सपना था शायद, हाँ सपना ही था । पर नीँद से जगा गया,  अब समझ आ गया उसका इशारा।
 ‘”तुम हमेशा ईश्वर की नज़र में हो”
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