संस्कार : है परवरिश ठोस तो सन्तान इन ठोकरों में खोयेंगी नही
संस्कार
यह कविता सुषमा पारख द्वारा रचित है. श्रीमती पारख अपनी कविताओं में सुसंस्कार निर्मार्ण पर विशेष बल देती है. तथास्तु टी वी के You Tube चैनल और Facebook पेज पर इनकी कविताएँ काफी चर्चित रही है. अब इनकी कविताएँ हमारे इस प्लेटफार्म भी आपको पढने मिलेगी.

सुषमा पारख की कविताओं में मर्म तक पहुँचने की क्षमता है. बदलाव की बयार लाने का जोश है. होश पूर्वक चलने का सन्देश है. तथास्तु टी वी की पूरी टीम उनके लिए मंगल कामना करती है. सुषमा जी काव्य रचना के अपने उत्साह को ऐसे ही बनाये रखेगी. अपनी कविताओं के माध्यम से संस्कारों की सुवास ऐसे फैलाती रहेगी.
पढ़िए कविता
मुश्किलें जीवन में कभी कम होएगी नहीं..
है परवरिश ठोस तो सन्तान इन ठोकरों में खोयेंगी नही..
गर दिया संस्कार हमने तो अनीति होएगी नही है… है परवरिश ठोस तो ….
चक्रव्यूह के जैसा है जीवन, बिन संस्कार के इनमें उलझते जाएंगे.. 2
गर दिए संंस्कार हमने तो ये उलझन खुद वो सुलझायेंगे…. 2
गम का घुट भी पीना पडे तो हंस कर सह जाएंगे…
ये गूढ़ रहस्य खुशियों का संस्कारो से ही समझ वो पायेंगे..

है परवरिश ठोस तो सन्तान इन ठोकरों में खोयेंगी नही
मुश्किलें जीवन में कभी कम होएगी नहीं
है संस्कार तो जीवन के रस को रसीला पाएंगे…. 2
अन्यथा राग, द्वेष, ईष्या, जलन, में ही रह जाएंगे…2
संस्कार गर बच्चों में भरते जाएंगे इस नयी पीढ़ी को एक ग़जब तोहफा हम दे जाएंगे…
संस्कारी बच्चें मुश्किलों में रोएँगे नही
धर्य अपना चूनौतीयों में खोएँगे नही है..
परवरिश ठोस तो सन्तान इन ठोकरों में खोएँगे नही…
मुश्किलें जीवन में कभी कम होएगी नहीं
है परवरिश ठोस तो …
निवेदन
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