International Womens Day पर अमिता संचेती की कविता

आज International Womens Day है. आज महिला शक्ति की बात हो रही है. उनके लिए सशक्तिकरण के लिए अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. पर क्या आज तक नारी को अपना सम्मान मिला है? क्या नारी स्वतन्त्र रूप से सोच पाती है? पुरुषवादी समाज में जब तक नारी को स्थान नही मिलेगा तब तक इस डे को मनाने की उपयोगिता सिद्ध नही होगी.

इन वर्षो में नारी का स्वरूप काफी कुछ बदला है. वो आत्मविश्वास के साथ अपने सपनों को पूरा करने लगी है. पुरानी जिम्मेदारियों के अतिरिक्त नई जिम्मेदारियां भी उठाने लगी है. फिर भी पुरुषवादी सोच ने अनेक समाजों की नारियों को अभी तक बेड़ियों में जकड़ रखा है. आज के इस विशेष दिवस पर हम नारी के श्रम को समझे. उसके संघर्ष को सम्मान दें, यह आवश्यक है.

नोखा राजस्थान की कवित्री अमिता संचेती ने International Womens Day पर नारी के संघर्ष को अपने सब्दों में पिरोया है. नारी खुद को कितने रूपों में प्रस्तुत करती है. कितनी जिम्मेदारियों में ढालती है, यह बहुत बड़ी साधना है. इस साधना को कविता में बांधना और भी बड़ी साधना है. अमिता संचेती ने इस साधना को जीया है इसके लिए बहुत बहुत सराहना. उनकी कविता तथास्तु टीवी के दर्शको के लिए प्रस्तुत है-

International Womens Day Special Poem

 वो नारी ही थी

बिखरे ना रिश्तों के फूल, धागों में पिरोती रही
सब्र के मशाल की ज्योति बन जलती रही
मूल्य और असूलों की ताकत को समझती रही
प्यार और पुरुषार्थ को तकदीर में बदलती रही
                                       वो नारी ही थी ….
आइने में देखकर आँसुओं को पौछंती रही
दर्द दिल में थे हजारों फिर भी मुस्कुराती रही
रोशनी देकर खुद मोम ज्यूँ पिघलती रही 
चैन से सोए सभी, खुद रात भर जगती रही 
                                       वो नारी ही थी ….
जीए नहीं अपने लिए पल, ओरों के लिए जीती रही 
कभी माँ, पत्नी, बहन बन धैर्य से सहती रही
ना बदले रिश्ता कोई खुद को वो बदलती रही
आई जो मुसीबत कोई, ढ़ाल बन तनती रही 
                                       वो नारी ही थी ….
दर्द अपना ना दिखा हमदर्द वो बनती रही
जिम्मेदारी की दीवारों में जिन्दगी जीती रही
संत, योद्धा, महापुरुष, देश के लिए जनती रही
थक गए कदम फिर भी ताउम्र चलती रही
                                       वो नारी ही थी ….
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