Tuesday, April 21, 2026
साहित्य - साधना

Nainika Jain की कविता : हाँ मैं गवार हूं

भीलवाडा के पास एक छोटे से कस्बे से तालुक रखने वाली Nainika Jain ने मंच संचालक के तौर पर राष्ट्रिय स्तर पर पहचान बनाई है. एंकरिंग करने वाला कविताओं का निर्माण ना करे यह बहुत कम देखने को मिलता है. नैनिका के सन्दर्भ में भी यही देखने को मिलता है. उसने जिस अंदाज में कविताओं का निर्माण किया है, उससे साफ झलकता है कि उसने भारत भ्रमण किया है.
नैनिका जैन जितना शानदार बोलती है उतना ही शानदार लिखती है. वो सीधी सरल भाषा में अन्दर की पीड़ा को बयान कर देती है. यही खूबी उसके लिए मंच संचालन की विधा में महारत हांसिल करने में मददगार बनी. TATHASTU TV के पाठकों के लिए उनकी एक कविता यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं. इस कविता माध्यम से Nainika Jain ने गांवों में बसते भारत की सच्ची कहानी को व्यंगात्मक प्रस्तुत किया है.
Nainika Jain

पढ़िए Nainika Jain की कविता 

हाँ मैं गवार हूं
अब शहर की आबोहवा में दम घुटता है  
हां मुझे गांव में रहना अच्छा लगता हैै
अगर देसी बोलना देसी रहना ही बवाल है 
तो आप सही कहते है अरे ये.पागल तो गवार है
…..हाँ मैं गवार हूं
आइए ना कभी कच्ची सड़कों पे,
बसती  हैं जहां सच्ची  इंसानियत ऐसे रस्तों पे
कहने को गांव के घर थोड़े कच्चे हैं
पर यकीन मानिए यहां के रिश्ते बड़े सच्चे हैं
शहरों में नहीं गांव में होती असल  मनुहार है
पर आप सही कहते है अरे ये सब लोग गवार है
…..हाँ मैं गवार हूं
जब कांच  से चमकते शहर की घुटन महसूस होने लगे
तब पधारिए गांव में ,
शायद उड़ती धूल भी आपको सुकून देने लगे
नेचुरोपैथी में मिट्टी से ठीक होते सारे पुराने  बीमार है
 पर आप सही कहते है मिट्टी में खेलने वाले बच्चे गवार है
…..हाँ मैं गवार हूं
शहरों की शराफत में बनावटीपन का नकाब ही दिखता है
यहां मय्यत के लिए रोने वालों का सैलाब भी बिकता है 
शहरों में मतलबी रिश्ते गावों में मिलता असली प्यार है 
पर आप सही कहते है अरे ये सब लोग गवार है
….हाँ मैं गवार हूं
 मेरा शहर  दिन रात भगता है
क्या आप सहमत नहीं  कि असली भारत गांव मे बसता है
महानगरों को छोड़  लोग गांव में आने लगे हैं 
 ब्रांडेड फूड छोड़ मक्का छाछ  चाव से खाने लगे हैं
गूगल जी भी जानते हैं gluten free बाजरा श्रेष्ठ.आहार है
पर आप सही कहते हैं यह सब खाने वाले तो गवार हैं
….हाँ मैं गवार हूं
सुनिए क्या आपको भी  नींद की गोलि की जरूरते पड़ती है 
क्या आप भी रात भर एसी का टेंपरेचर,
 और अपनी करवटें बदलती हैं?
तो जरा लीजिए ना वो गवारों वाली नींद 
जो कच्चे घरों की छत पर मिलती है
सितारों के सागर मे चांदनी की चादर में  ,
 सारी चिंताएं इक पल में पिघलती है।
सच बताइए
राजस्थानी गानों पर यो ही झूमना कैसा लगता है
अपनापन लिए मारवाड़ी बोलना कैसा लगता है
कोलेज मे झल्ली गवार सुनना भी अच्छा लगता है
गांव मे सिगड़ी के भुट्टे भाटे कि आरेंज कुल्फी का कोई मेल नहीं
 हर चीज की नैसर्गिकता बनाए रखना साधारण कोई खेल नहीं
मेरे भगवन तेरी ऐसी रहमत पाऊ
 शहरी कुसंस्कार के जल में
 तेल की बूंद बन जाऊ
और अब से फक्र मैं करती हू कि
हां मैं देशी मल्हार हूं 
शुद्ध स्वतंत्र बहती  बयार हू
सबसे गर्व से कहती हूं  कि
 हा मैं  गवार हूं,  हा मैं  गवार हूं।
by – Nainika Jain
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