Sandeep Vaishnav की कविता : तू बढ़ता चल
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में आने वाला छोटा सा क़स्बा पण्डेर के निवासी Sandeep Vaishnav की दिल को छुन्दे वाली कविताएँ होती है. मात्र 21 वर्ष की अवस्था में सटीक और सधे हुए शब्दों में कविता लिखना सराहनीय है. संदीप कुमार वैष्णव अपनी काव्य रचनाओं में शब्दों का तीखापन भी रखते हैं तो शालीनता से बदलाव की लहर भी छोड़ जाते हैं.
बचपन से ही कविताओं को पढने में रूचि रखने वाले Sandeep Vaishnav ने अपने अन्दर सीखते रहने की उत्कंठा विकसित की. इस उत्कंठा ने ही उनको मंजे हुए कवियों की श्रेणी में स्थान दिलाया है. तथास्तु टी वी के पाठको के लिए उनकी एक कविता प्रस्तुत की जा रही है. इस कविता को पढने के बाद आप स्वयं संदीप की क़ाबलियत को दाद देना नहीं भूलेंगे.

तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल : Sandeep Vaishnav
एक अमर ज्योति जलाने को,
पार्थ, स्वयं बन जाने को,
सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ता चल
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
चल एक अजाने पंथी सा,
तू है शिव के उस नन्दी सा,
बाधाएं होंगी अनन्त विकल,
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
वक,वानर,वृषिक,वंशी,वृषभ,
अपने बल पर जीते है सब,
तो बाँध कमर, कर एक पहल,
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
तू है अश्वमेध का अश्व बना,
जिसके सम्मुख तूफान घना,
कर त्वरित गति,न गवां ये पल,
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
आँखों में सपन इक पलता है,
ये भानू तो नित ही ढलता है,
तू जला स्वयं की एक अनल,
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
आशिष,शीश पर मान ले तू,
जो पाना है, वो ठान ले तू,
समय प्रतीक्षा में हाथ न मल,
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
बस हर जाएँगे ये, सब विकार,
मत रोक स्वयं को कर प्रहार,
नापेंगे अब ये,नभ, जल, थल,
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
दे उत्तर सभी प्रतिघातों का,
सुन शोर सभी सन्नाटो को,
जगमग होगा फिर जग ये कल,
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
तू चीर पहाड़ को सीने में,
है मज़ा गरल, नित पीने में,
यूँ बांधेंगे तेरा सब संबल,
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
तू न देख ये राहों के कंकर,
तू लगा नाद जय शिव शंकर,
फिर करेंगे तेरी सहस्त्र नकल,
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
अब जो ठाना है, वो पाएंगे,
हम अपना इतिहास बनाएंगे,
ले देख आ गया स्वर्णिम पल,
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
तू बढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
।।जय माँ सरस्वती।।
