भ्रमर की दास्तान -अमिता संचेती की दिल में उतरने वाली कविता
भ्रमर की दास्तान
भ्रमर की दास्तान शीर्षक से इस कविता की रचना अमिता संचेती ने की है. अध्यात्म के ग्रंथों में पढने को मिलने वाले एक कथानक को केंद्र में रख कर बनाई गई यह कविता बहुत ही गहराई लिए हुए है. किसी कथा या घटना को कविता में बढ़ना सरल नही होता. यह कार्य कोई कुशल कवि ही कर सकता है. अमिता संचेती एक कुशल गृहणी होने के साथ कुशल कवित्री भी है, यह इस कविता को पढ़ने के बाद आप समझ जायेंगे . कविता को पढ़े . उसके मर्म को समझे . जीवन को उसके अनुसार ढाले , यह अपेक्षा है .
कविता

सूरज ढल रहा था
अंधेरा आने को मचल रहा था
फुल मुरझाने वाले थे,
जुगनू जगमगाने वाले थे,
वही एक भ्रमर
कल्पनाओं का महल बना रहा था
रस पीकर फूलों का आनंद मना रहा था
मैंने कहा भँवरे से,
समय बहुत कम, बचा है तेरे पास
तृप्त हौके उड़जा, अब नीले आकाश
उसने कहा
नशा मदहोशी का छा रहा हैं,
थोड़ा और पीलु, मजा आ रहा है।
अरमा दिल में कई, सजाए जा रहा था।
इतनी भी क्या जल्दी है? कहे जा रहा था।
कल जब वापस, सूरज ये उगेगा
फैलाऊगाँ मैं पर, जब फूल ये खिलेगा।
ये सोच के महल, ख्वाबो के बना रहा था।

इधर काल रूपी हाथी, बवंडर मचा रहा था।
जैसे ही उसने सूंड से तरूवर को उखेड़ा
भ्रमर के सपनों को, टूटे काँच ज्यू बिखेरा
आशा के समन्दर में वो, व्यर्थ हो गया था।
वो कल कभी ना आया जिसका इन्तजार किया था।
जिन्दगी और मौत मे अब द्वंद हो गई।
धीरे-धीरे श्वास चलनी बन्द हो गई।
यहीं खत्म हो गयी भ्रमर की जिन्दगी,
जी न पाया आज में वो अपनी जिन्दगी।
सोच ले मानव, ये संसार भी मकरन्द है।
हम है भ्रमर! सांसे भी अपनी चंद है।
राग द्वेष कषायो की फैली यहा सुगंध है।
वक्त रहते सभंल गए तो आनंद ही आनंद है।
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